Trump aluminum tariffs: Coca-Cola Foundation से Success तक, Struggles, Growth

Trending News In Hindi: Coca-Cola, एक ऐसा ब्रांड जिसे पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन अब अमेरिका के रुख को देखते हुए अपनी मार्केट स्ट्रेटेजी और पैकेजिंग में बदलाव की प्लानिंग कर रहा है। हाल ही में, Coca-Cola ने ये कहा कि अगर अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा लगाई गई टैरिफ्स (Trump aluminum tariffs) की वजह से अगर ऐल्यूमिनियम के डिब्बों की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो कंपनी को प्लास्टिक की बोतलें ज्यादा इस्तेमाल करनी पड़ सकती हैं। ट्रंप ने स्टील और ऐल्यूमिनियम पर 25% का इम्पोर्ट टैक्स लगाया है, जिससे अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में कोका कोला अपनी पैकेजिंग स्ट्रेटेजी में बदलाव करेगी।

प्लास्टिक के ज्यादा इस्तेमाल से पर्यावरण को नुक्सान होगा, लेकिन कोका कोला के लिए यह कोई नई बात नहीं हैं। क्योंकि Coca-Cola पर पहले से ही पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं। इतना ही नहीं पिछले छह साल से पर्यावरण समूह (environmental groups) इसे “टॉप ग्लोबल प्लास्टिक पॉल्यूटर” कह रहे हैं। इस दबाव के बीच, Coca-Cola ने अपनी सस्टेनेबिलिटी टार्गेट को 2030 तक 50% रीसाइकल्ड मटेरियल्स से घटाकर 2035 तक 35%-40% करने का फैसला लिया है!

मेडिकल टॉनिक के तौर पर हुई शुरुआत

oca-Cola का सफर केवल इन मुद्दों तक ही सीमित नहीं है। इसके पास एक लंबी और दिलचस्प कहानी है। Coca-Cola की शुरुआत 1886 में हुई थी, जब इसे Dr. John Stith Pemberton ने एक मेडिकल टॉनिक के रूप में Atlanta, Georgia में तैयार किया था। इसका उद्देश्य सिर दर्द और अन्य बीमारियों के इलाज के रूप में काम करना था और इसे बनाने में कोका पत्तियाँ और कोला नट्स इस्तेमाल होते थे। Coca-Cola नाम का सुझाव Pemberton के बुककीपर, Frank M. Robinson ने दिया था, और उन्होंने ही इसका आइकोनिक लोगो डिज़ाइन किया था।

क्यों बिकी थी कंपनी?

Coca-Cola को अपनी शुरुआत में काफी मुश्किलें झेलनी पड़ी। काफी समय तक फाइनेंस को लेकर कंपनी परेशानी में रही, जिसके बाद कंपनी के फाउंडर Pemberton ने इसके कुछ हिस्से बेचने का फैसला किया। हालाँकि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन कोई और ऑप्शन नहीं थी, इसलिए उन्होंने 1889 में, Asa Candler नामक एक बिजनेस मैन को Coca-Cola कंपनी बेच दी। इसके बाद कंपनी फिर से मार्किट में अच्छी ग्रो करने लगी। इसके लिए काफी नए बदलाव भी किये गए, जिसके जरिए Coca-Cola ने एक बड़ी संख्या में अपने कस्टमर तैयार किये। इसके लिए टॉप क्लास ब्रांडिंग की गई और देखते ही देखते Coca-Cola बहुत फेमस हो गयी।

यहाँ पर मार्केटिंग के अलावा Coca-Cola को सफल बनाने में एक और चीज़ का हाथ था, वो थी कोका कोला की पैकिंग। यानी इसके लिए उन्होंने “क्रिएशन ऑफ़ बॉटलिंग सिस्टम” पर फोकस किया। 1899 में, Benjamin F. Thomas और Joseph Biedenharn ने Coca-Cola के लिए bottling rights प्राप्त किए। इससे Coca-Cola की पहुंच और भी बढ़ी, और अब इसे बोतल में बेचा जाने लगा। यह कदम Coca-Cola के ग्लोबल विस्तार के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ।

Coca-Cola कैसे बना ग्लोबल ब्रांड?

20वीं सदी में Coca-Cola ने कई मुश्किलें झेली, लेकिन देखते ही देखते बड़ी ब्रांड बन गयी और जबरदस्त विकास किया। Coca-Cola ने विभिन्न नई तकनीकों और मार्केटिंग स्ट्रेटेजीज़ के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। 1915 में, Coca-Cola ने अपनी खास कंटूर बोतल पेश की, जो कंपनी को एक अलग पहचान दिलाने में सफल रही।

आंतरराष्ट्रीय स्तर पर Coca-Cola के विस्तार ने इसे एक ग्लोबल ब्रांड बना दिया। इसके उत्पाद अब दुनिया भर में उपलब्ध थे, और 1970s तक Coca-Cola ने अपना मजबूत स्थान बना लिया था। 1980s में, Pepsi के साथ Cola Wars ने एक कड़ा मुकाबला पैदा किया, लेकिन Coca-Cola ने अपनी मार्केटिंग और उत्पाद नवाचारों के माध्यम से इस प्रतिस्पर्धा को अच्छे से संभाला।

शुगर-लोडेड Coca-Cola की वजह से मोटापा और डायबिटीज़

हाल के वर्षों में, Coca-Cola को स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। शुगर-लोडेड ड्रिंक्स की वजह से मोटापा और डायबिटीज़ जैसी समस्याएं बढ़ी हैं, जिसके कारण कई देशों में शुगर ड्रिंक्स पर टैक्स लगाए गए हैं। इस पर Coca-Cola ने डाइट कोका-कोला और Coca-Cola Zero Sugar जैसे लो-कैलोरी विकल्प पेश किए हैं। इसके अलावा, कंपनी ने अपनी उत्पाद रेंज को और भी विस्तृत किया है, जिसमें मिनिट मेड, डासानी और इनोसेंट जैसे हेल्दी ब्रांड्स भी शामिल हैं।

पर्यावरणीय चुनौतियाँ

Coca-Cola पर अक्सर पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर आलोचनाएँ होती रही हैं, खासकर प्लास्टिक कचरे के कारण। हालांकि, Coca-Cola ने अपने पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। कंपनी ने रीसाइक्लिंग तकनीकों में निवेश किया है और पैकेजिंग में स्थिरता लाने के प्रयास किए हैं। फिर भी, पर्यावरण समूहों द्वारा इसकी प्लास्टिक की निर्भरता पर निरंतर आलोचना की जाती रही है।

अंत में, Coca-Cola ने 1886 से लेकर अब तक एक लंबा सफर तय किया है। एक मेडिकल टॉनिक से लेकर दुनिया के सबसे बड़े बेवरेज ब्रांड बनने तक, Coca-Cola ने कई संघर्षों और अवसरों का सामना किया है। यह ब्रांड न केवल अपने स्वाद और गुणवत्ता के लिए जाना जाता है, बल्कि इसकी मार्केटिंग और नवाचार की रणनीतियों ने इसे पूरी दुनिया में एक घरेलू नाम बना दिया है। भविष्य में, Coca-Cola को अपनी रणनीतियों में निरंतर बदलाव और विकास करना होगा, ताकि यह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे बना रहे।

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