Bihar Teacher Suspension: क्या सरकारी नौकरी में Free Speech Possible है?

Kendriya Vidyalaya Jehanabad: बिहार में हाल ही में एक सरकारी महिला टीचर को उनके बिहार के एजुकेशन सिस्टम और प्रशासन के बारे में कमेंट करने के कारण सस्पेंड (Bihar Teacher Suspension) कर दिया गया। यह टीचर पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग की रहने वाली और जहानाबाद जिले के केंद्रीय विद्यालय (Kendriya Vidyalaya) में सर्विसेज दे रही थी। इस घटना ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सरकारी अनुशासन की बहस को तेज कर दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी कर्मचारियों को अपनी राय रखने का हक नहीं है, या फिर सरकारी अनुशासन के नियम इतने सख्त हैं कि वे किसी भी प्रकार के क्रिटिसिज्म को बर्दाश्त नहीं कर सकते? आइए, इस पूरे मामले को सरल और विस्तृत रूप से समझते हैं।

क्या कहा था शिक्षक ने और क्यों हुई कार्रवाई?

बिहार के एक सरकारी टीचर ने राज्य के एजुकेशन सिस्टम और सरकारी व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया पर कमेंट करते हुए एक रील शेयर कर दी है। इसके बाद, एजुकेशन डिपार्टमेंट ने इसे सिविल सर्विस रूल्स के खिलाफ माना है और इसलिए इंडिसीप्लीन के बेस पर उसे सस्पेंड कर दिया। सरकार का तर्क है कि सरकारी कर्मचारी सरकार के खिलाफ कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं कर सकते, जबकि कई लोग इसे लोकतांत्रिक अधिकारों (Freedom of Speech in India) के खिलाफ मान रहे हैं। यहाँ सवाल ये उठता है – क्या एक सरकारी कर्मचारी को अपने राज्य की कमियों पर बात करने का हक नहीं है?

क्या कहता है कानून और सरकारी नियम?

अब, जहाँ संविधान हमें आर्टिकल 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of expression) देता है, वहीं सरकारी कर्मचारियों पर कुछ एक्स्ट्रा नियम लागू होते हैं।

  1. सिविल सर्विस रूल्स (Central Civil Services Conduct Rules, 1964): इसके तहत सरकारी कर्मचारी सरकार की छवि खराब करने वाले बयान नहीं दे सकते। वे सरकारी नीतियों और योजनाओं के बारे में पब्लिकली गलत नहीं बोल सकते। अगर वे सोशल मीडिया या किसी पब्लिक प्लेटफार्म पर सरकार के खिलाफ कोई बयान देते हैं, तो उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।
  2. भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत लागू नियम: IPC 124A (देशद्रोह) के तहत अगर कोई बयान सरकार के खिलाफ विद्रोह भड़काने वाला हो, तो ये मामला देशद्रोह में आ सकता है। इसके अलावा ऐसे मामलो में IPC 505 (अफवाह फैलाने और समाज में तनाव बढ़ाने) के तहत भी कार्रवाई हो जाती है, अगर किसी कमेंट से लोग भड़क जाते हैं, तो ये धारा लागू हो सकती है। वहीँ IPC 500 (मानहानि का अपराध) के तहत अगर किसी बयान से सरकार की छवि को नुकसान पहुंचता है, तो उस व्यक्ति पर मानहानि का केस भी बन सकता है।
  3. सरकारी अनुशासन का नियम: सरकारी कर्मचारी अपनी पर्सनल राय रख सकते हैं, लेकिन सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया या किसी भी पब्लिक प्लेटफार्म पर कुछ भी कहने से पहले परमिशन लेना जरूरी है। यदि उनके कमेंट से संविधान के खिलाफ या लोगों को भड़काने वाली या उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली होगी, तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं?

कर्नाटक (2021): एक प्रोफेसर ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए थे। इसका नतीजा यह हुआ था कि उसे भी सस्पेंशन आर्डर मिल गया था। वहीँ 2019 में उत्तर प्रदेश में एक आईएएस अधिकारी ने राज्य सरकार के फैसलों की आलोचना की, तो ट्रांसफर कर दिया गया। इसके अलावा ऐसा मामला 2022 में पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला था, जब एक सरकारी टीचर ने स्कूलों की व्यवस्था पर कमेंट किया, और इस मामले में भी टीचर को सस्पेंड कर दिया गया था। इतना सब कुछ देखने के बाद एक बात तो साफ़ है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए सरकार की आलोचना करना एक रिस्की गेम हो सकता है।

क्या यह Freedom of Speech के खिलाफ है?

सरकार का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों को अपने पद की गरिमा बनाए रखनी चाहिए और किसी भी सार्वजनिक मंच पर ऐसा बयान नहीं देना चाहिए, जिससे सरकार की छवि खराब हो। मतलब, अगर सरकारी कर्मचारी सरकार के खिलाफ बोलेंगे, तो जनता का भरोसा सरकार से हट सकता है।

वहीँ विरोध करने वालों का कहना है कि सरकारी कर्मचारी भी इस देश के नागरिक हैं, तो क्या उन्हें सरकार की आलोचना करने का हक़ नहीं होना चाहिए? अगर कोई टीचर एजुकेशन सिस्टम में सुधार के लिए आवाज़ उठा रहा है, तो उसे सज़ा क्यों मिलनी चाहिए? सरकारी नियमों और लोकतांत्रिक मूल्यों में बैलेंस जरूरी है। सरकारी कर्मचारियों को पूरी तरह से सरकार की आलोचना करने से नहीं रोका जाना चाहिए, लेकिन उन्हें अपनी राय सही मंच पर और सही भाषा में रखनी चाहिए। ‘ग्रिवांस रेड्रेसल सिस्टम’ को मजबूत किया जाए। अगर सरकारी कर्मचारियों को किसी सरकारी नीति से दिक्कत है, तो उन्हें अपनी शिकायतें रखने का एक आधिकारिक प्लेटफार्म मिलना चाहिए। सोशल मीडिया पॉलिसी को और क्लियर किया जाए। सरकार को यह साफ़ बताना चाहिए कि किन मामलों में सरकारी कर्मचारी पब्लिक प्लेटफार्म पर बोल सकते हैं और किन मामलों में नहीं।

इस पूरे मामले में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं। एक तरफ़, सरकारी अनुशासन बनाए रखना ज़रूरी है, तो दूसरी तरफ़, लोकतंत्र में सभी नागरिकों को अपनी बात कहने की आज़ादी भी होनी चाहिए। ऐसे मामलों में सरकार को सीधे सस्पेंशन देने के बजाय, पहले वार्निंग देकर बातचीत करनी चाहिए। क्यों न सरकारी कर्मचारियों के लिए एक independent platform बनाया जाए, जहाँ वे अपने विचार रख सकें, बिना किसी डर के?

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